मिर्जा गालिब की गजल का एक शेर है. वो लिखते हैं कि पहले आती थी हाल-ए-दिल पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती. इसी गजल का आखिरी शेर है कि का’बा किस मुंह से जाओगे ‘गालिब’, शर्म तुम को मगर नहीं आती. और शर्म तो गलगोटिया वालों को भी नहीं आती. क्योंकि शर्म आती तो राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे एआई ग्लोबल समिट में इतनी बेशर्मी नहीं हुई होती कि जिस आयोजन का मकसद पूरी दुनिया में एआई के इर्द-गिर्द चल रहे इनोवेशन पर बात करना हो, जिस आयोजन का मकसद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भविष्य पर बात करना हो, जिसका मकसद एआई के जरिए वर्तमान को बेहतर करना हो, उस आयोजन के पांच दिन बीतने के बाद भी चर्चा सिर्फ इस बात की है कि गलगोटिया वालों ने देश और विदेश में इस आयोजन को अपनी बेशर्मी की वजह से शर्मसार कर दिया है.
भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित इस एआई समिट का सबसे बड़ा मकसद था Deepfakes, साइबर हमलों और एआई के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए वैश्विक नियम बनाना. इस समिट के जरिए भारत की कोशिश दुनिया के सामने एक नजीर पेश करने की थी ताकि दुनिया के ताकतवर देशों को भी इस बात का इल्हाम हो सके कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिर्फ विकसित देशों की जागीर नहीं है और भारत भी इस एआई का एक बड़ा हिस्सेदार है. यही वजह थी कि इस समिट में ओपन एआई के सैम ऑल्टमैन, गूगल के सुंदर पिचाई, एनवीडिया के जेन्सेन हुआंग जैसी बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधियों के अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्राजील के राष्ट्रपति सहित 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए. 300 से अधिक स्थापित कंपनियों और 600 से ज्यादा स्टार्टअप्स को यहां पर लाइव डेमो दिखाने का मौका मिला.
इस पूरे आयोजन में चर्चा किस बात की हुई. गलगोटिया की करतूत की. पहले तो उसने चीन के बनाए रोबोट को ऑनलाइन खरीदा, फिर उस रोबोट के जरिए एआई समिट में हिस्सा लिया और फिर उसी रोबोट को दिखाकर दावा कर दिया कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एआई इनोवेशन में 300 करोड़ रुपये का निवेश किया है. लेकिन जिस रोबोट को लेकर गलगोटिया आया, उसे कोई भी सजग आदमी देखकर बता सकता था कि ये चीन का रोबोट Unitree Go2 है, जिसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की ओर से बनाए जाने का दावा कर रही हैं.
यूनिवर्सिटी का ये फर्जीवाड़ा अगर भारत तक ही सीमित रहता तो शायद इतनी छीछालेदर नहीं होती. लेकिन जब चीन ने भी इस रोबोट को अपना बताकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करना शुरू कर दिया और वहीं से बात बिगड़ गई. गलगोटिया की थू-थू होने लगी तो अपनी गलती मानने के बजाय यूनिवर्सिटी ने उसपर लीपापोती शुरू कर दी और इसी लीपापोती में 6 को 9 और 9 को 6 बनाकर ऐसा कांड कर दिया कि सरकार को भी दखल देना पड़ा और फिर यूनिवर्सिटी को समिट से अपना झोला उठाकर भागना पड़ गया.
लेकिन जब यूनिवर्सिटी के लोग अपना टेंट-तंबू उखाड़कर गए तो अपना वो चाइनीज रोबोट भी साथ लेकर गए. लेकिन असल में यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की ओर से जो अनूठा प्रोडक्ट बनाया गया था, उसे वो उसी समिट में ही छोड़कर चले गए. क्योंकि उनका बनाया प्रोडक्ट एक ड्रोन था, जिसे किसी भी स्कूल के पांचवीं क्लास में पढ़ने वाला स्टूडेंट भी उस ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ से बेहतर बना सकता था. यकीन न हो तो गलगोटिया का बनाया हुआ ओरिजिनल प्रोडक्ट भी देख लीजिए.
इस ओरिजिनल प्रोडक्ट के सामने आने के बाद यूनिवर्सिटी की बची-खुची रेप्युटेशन भी खत्म हो गई. चारों तरफ थू-थू होता देखकर यूनिवर्सिटी ने सफाई जारी की और पूरा ठीकरा उस प्रोफेसर के मत्थे मढ़ दिया, जिनके नेतृत्व में एआई समिट में गलगोटिया ने अपना स्टॉल लगा रखा था. बचाव में यूनिवर्सिटी ने प्रोफेसर को नासमझ तक करार दे दिया और कह दिया कि वो मीडिया में बाइट देने के लिए अधिकृत नहीं थीं.
तो सवाल ये है कि फिर अधिकृत कौन था. और जो अधिकृत था, जो इस प्रोडक्ट के बारे में सवाल पूछने पर बता सकता था, वो कहां था. जाहिर है कि इसका कोई जवाब उस यूनिवर्सिटी के पास नहीं है, जिसके मालिकान कभी 122 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और लोन डिफाल्ट के मामले में जेल गए थे. और जमानत के बाद उनकी रिहाई हुई थी.
हालांकि इतने बड़े फ्रॉड के बाद दो-चार लाख रुपये का चीनी रोबोट लाकर और उसे अपना बताकर वाहवाही लूटना तो गलगोटिया के लिए छोटी सी ही बात है. क्योंकि गलगोटिया और उसके मालिकान से जितने भी सवाल पूछे गए हैं वो या तो मीडिया ने पूछे हैं या फिर सोशल मीडिया है. न तो केंद्र सरकार और न ही दिल्ली सरकार और न ही उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से किसी भी अधिकारी ने गलगोटिया को ये फ्रॉड करने और इस फ्रॉड के जरिए पूरी एआई समिट को बर्बाद करने का एक नोटिस भर भी दिया है.
क्योंकि अगर कोई सरकारी नोटिस जाएगा तो सवाल सरकारी प्रतिनिधियों से भी तो होगा कि आखिर किस अधिकारी ने गलगोटिया की कौन सी उपलब्धि या उसका कौन सा इनोवेशन देखकर उसे उस एआई समिट में इतना बड़ा स्टॉल अलॉट किया था. आखिर किसकी देखरेख में उस चाइनीज रोबोट को गलगोटिया का अपना बनाया रोबोट बताने के बाद उस समिट में एंट्री दी गई थी. आखिर वो कौन था, जिसने बिना कुछ जांचे-परखे दूसरे के प्रोडक्ट को अपना बताने वाले फ्रॉड गलगोटिया के लिए एआई समिट के दरवाजे खोल दिए थे. आखिर भारत की इस एआई समिट की हुई ग्लोबल बेइज्जती का जिम्मेदार कौन है, जिसकी अभी तक शिनाख्त नहीं हो सकी है.
जाहिर है कि इसका जवाब नहीं मिलेगा. क्योंकि एआई समिट में हुई इस इंटरनेशनल बेइज्जती की जितनी जिम्मेदार ये गलगोटिया यूनिवर्सिटी है, सरकार भी उस बेइज्जती में बराबरी की भागीदार है. वरना गलगोटिया की तरह के ड्रोन तो हमारे-आपके बच्चों ने भी खेल-खेल में बना ही लिए हैं. अगर यही एआई इनोवेशन है तो फिर हमारे-आपके बच्चों को भी उस एआई समिट में एक स्टाल तो मिलना ही चाहिए, जहां वो भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें.
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