आज के समय में लगभग हर किसी के पास खुद का पर्सनल स्मार्टफोन है. जानकारी, पढ़ाई, काम और मनोरंजन सब कुछ एक स्क्रीन में समाहित हो गया है. लेकिन इसी फोन स्क्रीन के अंदर एक जहर भी छिपा है, अश्लील वीडियो और गंदा कंटेंट, लोग यही सोचते हैं कि, बस देखने भर से क्या ही होगा, इससे क्या ही फर्क पड़ सकता है? बस यही सबसे बड़ी गलतफहमी है.
श्री राजेंद्र दास जी महाराज, जो वृंदावन स्थित मलूक पीठ के पीठाधीश्वर हैं, इसपर उनका साफ कहना है कि, इंसान जिस चीज को आंख, कान और मन से बार-बार ग्रहण करता, उसका चरित्र वैसा ही बनता चला जाता है.
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आंख और मन का सीधा संबंध
हम जो भी अपने आंखों से देखते हैं, वह सीधा हमारे मन में उतरता है. अश्लील वीडियो को देखने से दिमाग में वहीं गंदी तस्वीरें या विचार घूमते रहते हैं, फिर वही सोच आदत में शामिल हो जाती है और धीरे-धीरे व्यवहार में, इंसान बाहर से सामान्य दिखता है, लेकिन अंदर से मानसिक रूप से कमजोर और बेचैन हो जाता है.
लोग कहते हैं कि, हमें भगवान की भक्ति करते रहनी चाहिए, इससे सब ठीक हो जाता है, लेकिन महाराज राजेंद्रदास जी का कहना है कि, जो व्यक्ति पूरे दिन गंदे दृश्य देखता है और रात में भगवान को याद करने का नाटक करता है, उसका मन कभी भी शुद्ध नहीं होगा.
अजामिल की कहानी सबक से भरी
भागवत पुराण में अजामिल की कथा है, जिसमें बताया गया है कि, एक समय पवित्र ब्राह्मण था, लेकिन उसने केवल आंखों से गलत चीजें देखीं और कानों से गलत बातें सुनीं और उसका पतन शुरू हो गया. कहने का मतलब साफ है कि, पतन हमेशा कर्म से नहीं, नजर से शुरू होती है.
5 इंद्रियों का पवित्र आहार
राजेंद्रदास महाराज के अनुसार, इंसान को 5 इंद्रियों से पवित्र आहार ग्रहण करना चाहिए-
- आंखों से वही देखो जो शुद्ध हो
- कानों से वही सुनों जो अच्छा हो
- नाक से भगवान से जुड़ी सुंगध का आनंद उठाओ
- जीभ से प्रसाद और नाम कथा का आनंद लो
- और स्पर्श वही जो मर्यादित हो
जब ये 5 इंद्रियां गंदी चीजें लेने लगती हैं, तो आत्मा कमजोर हो जाती है.
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मोबाइल की लत एक अदृश्य जाल
अश्लील वीडियो देखने से कब ये आपकी आदतों में शामिल हो जाएगी, आपको पता भी नहीं चलेगा. इस तरह के अश्लील चलचित्रों को देखने से समय बर्बाद होने के साथ दिमाग थकता है और रिश्तों में दूरियां बढ़ती हैं.
फोन कोई बुरी चीज नहीं है, लेकिन उसका गलत प्रयोग इंसान को अंदर से तोड़ देता है. अगर सच में जीवन में भक्ति, शांति और स्थिरता चाहिए तो सबसे पहले आंखों का रास्ता साफ करों. जो देखना चाहिए वही देखो, बाकी सब को नजरअंदाज करना ही असली साधना है.
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