महोबा में प्रेमी जोड़े ने जातीय विरोध के बावजूद बालिग होते ही मंदिर में जाकर प्रेम विवाह कर लिया. दो वर्ष तक दोनों बालिग होने का इंतजार करते रहे और जैसे ही बालिग हुए देवी प्रतिमा को साक्षी मानकर वरमाला और सिंदूर से अपनी शादी पूरी की. अब वे भगवान के सामने एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमें खा चुके हैं. परिजनों के विरोध के बाद भी छुप-छुप कर प्रेम करने वाले यादव जाति के अमित ने राजपूत जाति की आराधना से विवाह कर एक हो गए.
दरअसल, पूरा मामला महोबा शहर के मोहल्ला सत्तीपुरा से सामने आया है. सत्तीपुर में रहने वाले अमित यादव और ग्रामीण क्षेत्र की रहने वाली आराधना राजपूत ने दो साल तक छुप-छुप कर प्रेम किया. दोनों अलग-अलग जाति के होने के कारण अपने-अपने परिवारों के विरोध का सामना कर रहे थे.
प्रेमी जोड़े ने क्या कहा?
अमित और आराधना का कहना है कि उनके परिवार विवाह के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन प्रेम की मजबूरी ने उन्हें अलग राह चुनने पर मजबूर किया. बालिग होने का इंतजार करते हुए उन्होंने तय किया कि जैसे ही वह दोनों कानूनी रूप से बालिग होंगे, वह मंदिर में जाकर शादी कर लेंगे. जैसे ही दिन आया, दोनों ने छोटी चंद्रिका मंदिर में देवी प्रतिमा को साक्षी मानकर प्रेम विवाह किया.
एक दूसरे को वरमाला पहनाकर की शादी
इस दौरान अमित ने आराधना को वरमाला पहनाई और मांग में सिंदूर भरते हुए भावुक हो गए. आराधना ने भी प्रेमी से पति बने अमित के पैर छूकर साथ जीने-मरने की कसमें खाई. अमित बताते हैं कि इस विवाह के पीछे उनका दृढ़ विश्वास और प्रेम ही प्रेरणा था. उन्होंने कहा कि परिवारों के विरोध और जातीय बंधनों के बावजूद उन्होंने एक-दूसरे को अपनाया.
प्रेमी जोड़े ने की प्रशासन से अपील
वहीं प्रेमिका व अमित की पत्नी आराधना का कहना है कि यह विवाह पूरी तरह उनकी मर्जी से हुआ और वे अब अपने वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार की रोक-टोक बर्दाश्त नहीं करेंगी. दोनों ने पुलिस और प्रशासन से अपील की है कि उनके वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा ना डाली जाए. यह विवाह न केवल उनके प्रेम का प्रतीक है बल्कि यह दिखाता है कि सच्चा प्रेम जाति और सामाजिक बंधनों से ऊपर होता है.
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