Margashirsha Month Fast and Festival List: हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के बाद कार्तिक मास भी खत्म हो चुका है और मार्गशीर्ष महीने की शुरुआत 6 नवंबर 2025 से हो चुका है, जिसे अगहन का महीना भी कहा जाता है. मार्गशीर्ष हिंदू कैलेंडर का 9वां महीना है.
इस महीने में भगवान श्रीकृष्ण और श्री विष्णु की विशेष तौर पर पूजा की जाती है. मार्गशीर्ष माह में काल भैरव जयंती, उत्पन्ना एकादशी,सोम प्रदोष व्रत रखा जाएगा.
कालाष्टमी/ काल भैरव जयंती 2025
भगवान शिव के रौद्र रूप को काल भैरव के नाम से जाना जाता है, जिन्हें समय के अधिपति और धर्म के रक्षक के रूप में जाना जाता है. काल भैरव जयंती प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. इस दिन भगवान शिव ने काल भैरव रूप में अवतार लिया था.
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद खड़ा हो गया. ब्रह्मा जी ने खुद को सर्वोच्च बताया. ब्रह्मा के इस अभिमान को देखकर शिवजी क्रोध से भर उठे और उनसे एक तेजस्वी दिव्य रूप प्रकट हुआ, जो काल भैरव थे.
काल भैरव ने ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट करने के लिए उनके एक मस्तक को काट दिया, जिसके कारण उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा. प्रायश्चित के लिए काल भैरव ने भिक्षाटन किया.आखिर में काशी में उनका दोष खत्म हुआ. तभी से काशी को मुक्तिधाम कहा जाता है, जहां खुद काल भैरव नगर के कोतवाल हैं. काल भैरव का वाहन कुत्ता, जिसे निष्ठा और सतर्कता का प्रतीक माना जाता है.
उत्पन्ना एकादशी 2025
मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की ग्यारहवीं तिथि की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है. ऐसा माना जाता है कि, इस व्रत को रखने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है.
मान्यताओं के मुताबिक उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने वाले लोगों को व्रत रखने से एक पहली रात यानी दशमी तिथि को भोजन नहीं करना चाहिए.इसके अलावा एकादशी को ब्रह्मवेला में भगवान की पूजा करके ही आरती करनी चाहिए.
सोम प्रदोष व्रत 2025
हिंदू धर्म में भगवान शिव की उपासना अनेकों रूप में की जाती है, जिनमें प्रदोष व्रत का भी विशेष महत्व होता है. सोमवार के दिन व्रत होने के कारण इसे सोम प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है. इस साल सोम प्रदोष व्रत 17 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा.
प्रदोष काल से मतलब सूर्यास्त से करीब 1.5 घंटे पहले के समय को भगवान शिव की आराधना के लिए उत्तम माना जाता है. स्कंद पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय विष प्रकट होने के कारण देवताओं और समस्त ब्रह्मांड की रक्षा करने के लिए शिव ने उसे पी लिया. उसी संध्या को देवताओं ने शिव की याद में प्रदोष व्रत की परंपरा को शुरू किया.
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