Tulsi Vivah 2025: 2 या 3 नवंबर 2025 कब है तुलसी विवाह? जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

तुलसी विवाह हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है, जो माता तुलसी और भगवान शालिग्राम के दिव्य विवाह का प्रतीक माना जाता है. यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है और इसे चातुर्मास की समाप्ति एवं शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत के रूप में देखा जाता है.

तुलसी विवाह हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है, जो माता तुलसी और भगवान शालिग्राम के दिव्य विवाह का प्रतीक माना जाता है. यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है और इसे चातुर्मास की समाप्ति एवं शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत के रूप में देखा जाता है.

धार्मिक महत्व: चातुर्मास के दौरान विवाह और अन्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं. तुलसी विवाह के साथ ही इन कार्यों की शुरुआत होती है. जो भक्त विधि-पूर्वक तुलसी जी का कन्यादान करते हैं, उन्हें महादान का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है. यह व्रत दांपत्य जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि लाने वाला माना जाता है.

धार्मिक महत्व: चातुर्मास के दौरान विवाह और अन्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं. तुलसी विवाह के साथ ही इन कार्यों की शुरुआत होती है. जो भक्त विधि-पूर्वक तुलसी जी का कन्यादान करते हैं, उन्हें महादान का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है. यह व्रत दांपत्य जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि लाने वाला माना जाता है.

तुलसी पूजा और लाभ: तुलसी को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है. उनकी पूजा घर में सुख-समृद्धि लाती है और सभी प्रकार के दोष व बाधाएं दूर करती है. तुलसी विवाह का आयोजन विशेष रूप से उन लोगों के लिए शुभ है जिनके विवाह में देरी हो रही हो.

तुलसी पूजा और लाभ: तुलसी को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है. उनकी पूजा घर में सुख-समृद्धि लाती है और सभी प्रकार के दोष व बाधाएं दूर करती है. तुलसी विवाह का आयोजन विशेष रूप से उन लोगों के लिए शुभ है जिनके विवाह में देरी हो रही हो.

तिथि और समय: ⦁	तुलसी विवाह: रविवार, 2 नवंबर 2025 ⦁	द्वादशी तिथि प्रारंभ: 2 नवंबर 2025, सुबह 7:31 बजे ⦁	द्वादशी तिथि समाप्त: 3 नवंबर 2025, सुबह 5:07 बजे

तिथि और समय: ⦁ तुलसी विवाह: रविवार, 2 नवंबर 2025 ⦁ द्वादशी तिथि प्रारंभ: 2 नवंबर 2025, सुबह 7:31 बजे ⦁ द्वादशी तिथि समाप्त: 3 नवंबर 2025, सुबह 5:07 बजे

पौराणिक कथा: कथा के अनुसार, वृंदा का विवाह जालंधर नामक असुर से हुआ था. वृंदा की पतिव्रता भक्ति के कारण जालंधर अजेय बन गया था. देवताओं की सहायता के लिए भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के साथ छल किया. इसके बाद शिव जी ने जालंधर का वध किया.

पौराणिक कथा: कथा के अनुसार, वृंदा का विवाह जालंधर नामक असुर से हुआ था. वृंदा की पतिव्रता भक्ति के कारण जालंधर अजेय बन गया था. देवताओं की सहायता के लिए भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के साथ छल किया. इसके बाद शिव जी ने जालंधर का वध किया.

परंपरा और व्रत: वृंदा ने भगवान विष्णु को पहचानते ही उन्हें शालिग्राम बनने का शाप दिया और स्वयं तुलसी के रूप में जन्म लिया. भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति देखकर वरदान दिया कि उनका विवाह हर वर्ष शालिग्राम के साथ होगा. तभी से तुलसी विवाह की यह परंपरा श्रद्धा और विधि-व्यवस्था के साथ मनाई जाती है.

परंपरा और व्रत: वृंदा ने भगवान विष्णु को पहचानते ही उन्हें शालिग्राम बनने का शाप दिया और स्वयं तुलसी के रूप में जन्म लिया. भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति देखकर वरदान दिया कि उनका विवाह हर वर्ष शालिग्राम के साथ होगा. तभी से तुलसी विवाह की यह परंपरा श्रद्धा और विधि-व्यवस्था के साथ मनाई जाती है.

Published at : 21 Oct 2025 04:28 PM (IST)

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