भगवान श्रीराम (Lord Rama) का जन्म धरती पर त्रेतायुग में मानव रूप में हुआ. लेकिन थे तो वो देवता ही. उन्हें भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है. दुनियाभर में ऐसे कई लोग हैं जो भगवान राम के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा रखते हैं, जिनमें महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) भी एक थे.
राम नाम की गाथा तो धार्मिक ग्रंथों, श्लोकों और पुस्तकों में भी वर्णित है. लेकिन दुनियाभर के तमाम विद्वानों ने यह माना कि महात्मा गांधी 20वीं सदी के सबसे बड़े व्यक्तित्व थे. बापू की तुलना बुद्ध, ईसा, सुकरात जैसे महान सर्वकालिकों से की जाती है. शायद ही ऐसा कोई लेखक हो जिसने गांधी जी के व्यक्तित्व पर अपनी कलम न चलाई हो. भगवान राम और महात्मा गांधी को आजानुबाहु भी कहा जाता है.
भगवान राम क्यों कहलाएं आजानुबाहु
वाल्मीकि ने राम को आजानुबाहु कहा तो वहीं तुलसीदास ने उन्हें आजानुभुज शरचापधर कहा. वाल्मीकि रामायण के बालकांड के पहले सर्ग में आजानुबाहुः,सुशिराः,सुललाटः,सुविक्रमः जैसे शब्द आते हैं (1.1.10). इसका अर्थ है- भगवान राम की छाटी चौड़ी थी, साथ में बड़ा धनुष रखते थे, गर्दन को हड्डियां दिखाई नहीं देती थी, घुटने तक जाते हुए हाथ थे, ललाट और सिर सुंदर था और चलने का ढंग भी सुंदर था.
इसलिए महर्षि वाल्मिकी ने श्रीराम को आजानुबाहू कहा. इसका कारण यही था कि, उनकी भुजाएं उनके घुटने के नीचे तक पहुंचती थी. सामुद्रिक शास्त्र (Samudrika Shastra) जोकि ज्योतिष की ऐसी विद्या है, जिसमें शरीर की सरंचना, चिह्नों और अंगों से व्यक्ति के गुण और स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है.
इसमें ऐसे व्यक्ति को बहुत ही दुर्लभ बताया गया है, जिसके खड़े होने पर उसके हाथ घुटने के नीचे तक जाए. साथ ही इन्हें तेजस्वी भी माना जाता है. कहा जाता है ऐसे शीरीरिक संचरना वाले व्यक्ति बहुत कम संख्या में जन्म लेते हैं.
गांधी को क्यों कहा जाता है आजानुबाहु
आजानुबाहु (Ajanubahu) एक संस्कृत शब्द है, जिसका प्रयोग ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए क्या जाता है, जिसके भुजाओं की लंबाई ऐसी हो कि खड़े होने पर उसकी उंगलियां उसके घुटनों तक पहुंचती हो. इसमें अजानु का मतलब है ‘घुटने तक’, जानु का अर्थ है ‘घुटना’ और बाहु का अर्थ है ‘भुजा या बांह’. वैसे तो संसार में आजानुबाहु केवल श्रीराम ही हुए लेकिन महात्मा गांधी की शारीरिक संरचना भी ऐसी ही थी, इसलिए राम भगवान के साथ गांधी जी को भी आजानुबाहु कहा जाता है.
गांधी के राम…
महात्मा गांधी के जीवन पर भगनाव राम का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था. बचपन से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक उनके मुख पर केवल राम ही रहे. भगवान रामचंद्र हमारे समाज में ऐसे देवता हैं, जिन्हें सब ने अलग-अलग तरह से जानने की कोशिश की. इसलिए कहा जाता है कि सबके अपने-अपने राम हैं. राम के बारे में जानना की लालसा गांधी में भी थी. लेकिन महात्मा गांधी के राम अद्भुत हैं. रामचंद्र गांधी के इतने निकट रहे कि उन्होंने आदर्श समाज का नाम ही राजराज्य रखा. गांधी का मानना था कि, यदि रामराज्य शब्द किसी को बुरा लगे तो उस राज्य को मैं धर्मराज्य कहूंगा.
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि गांधी अन्य धर्मों का सम्मान नहीं करते थे. बल्कि वे सभी धर्मों को एक मानते थे. साथ ही उनकी नजर में राम सबके लिए बराबर थे. इसलिए महात्मा गांधी का प्रिय गीत था रघुपति राघव राजा राम. इसमें ईश्वर-अल्लाह दोनों का नाम जुड़ा जो स्वतंत्रता के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना.
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