राजस्थान: जर्जर सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर हाईकोर्ट ने फिर जताई चिंता, जानें क्या दिए आदेश

राज्य के सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों और बजट की भारी कमी को लेकर बड़ा कदम उठाया गया है. शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्कूल भवनों की मरम्मत, पुनर्निर्माण और बुनियादी सुविधाओं के लिए नई डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार करें. इस मुद्दे पर राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने राज्य सरकार के बजट पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि स्कूल बिल्डिंग्स के लिए आवंटन ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ जैसा है, जो जमीनी जरूरतों के मुकाबले बेहद अपर्याप्त है.

हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के लिए 20 हजार करोड़ रुपए की जरूरत है. 11 फरवरी को पेश हुए राजस्थान सरकार के बजट में जर्जर स्कूलों की मरम्मत के लिए सिर्फ 550 करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई है. इसके अलावा स्कूलों की नई बिल्डिंग्स के लिए 450 करोड़ रुपए मंजूर किए गए हैं. जर्जर स्कूल बिल्डिंग्स को ठीक कराने के लिए सिर्फ पांच फीसदी ही रकम मिली हुई है. ऐसे में सरकार को बताना चाहिए कि बाकी के पैसों का इंतजाम कैसे और कहां से होगा.

क्या स्कूलों की मदद के लिए मांग कर रही है सरकार

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक तरफ राजस्थान के सांवरिया सेठ मंदिर में सालाना 600 करोड़ रुपए का चढ़ावा आता है. लेकिन शिक्षा विभाग को कोई भी मदद नहीं कर रहा है. स्कूलों की हालत को लेकर उद्योगपतियों और संस्थाओं द्वारा मदद नहीं किए जाने का साफ मतलब है कि लोगों को आप यानी शिक्षा विभाग पर भरोसा नहीं है. यह भरोसा कायम करना होगा. पांच मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में डिटेल्स प्रोजेक्ट रिपोर्ट पेश करनी होगी.

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए ओपन कोर्ट में कहा कि सरकारी स्कूलों की जर्जर हो चुकी बिल्डिंग्स बच्चों की जिंदगी और सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं. सरकार के पास इन्हें ठीक कराने का बजट नहीं है. अगर सरकार बजट का इंतजाम नहीं कर पा रही है तो उसे यह बोर्ड लगा देना चाहिए कि हम बच्चों को सुरक्षा नहीं दे सकते है.

हेल्थ सेक्टर को छोड़ बाकी सेक्टर में जारी हुए टेंडर्स

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि आने वाली तारीखों पर वह इस बात पर भी विचार कर सकती है कि हेल्थ सेक्टर को छोड़कर बाकी सेक्टर के लिए जारी हुए टेंडर्स को रोक दिया जाए. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा है कि वह शिक्षा विभाग समेत दूसरे मदों में जारी हुए बजट की मॉनिटरिंग कराए जाने के बारे में भी विचार करना चाहती है.

हाईकोर्ट ने इस बारे में वकीलों से सुझाव देने के लिए भी कहा है कि कोर्ट नहीं अभी कहा कि इन्हीं वजहों से सरकारी स्कूलों से बच्चों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच इस मामले में पांच मार्च को फिर से सुनवाई करेगी. इस केस से जुड़े हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अधिवक्ता वागीश कुमार सिंह के मुताबिक राजस्थान के झालावाड़ जिले में 26 जुलाई को स्कूल बिल्डिंग गिरने से 6 बच्चों की मौत के बाद हाईकोर्ट ने सुओ मोटो लेकर जनहित याचिका कायम करते हुए सुनवाई शुरू की थी. तब से हाईकोर्ट लगातार स्कूलों की हालत को लेकर मॉनिटरिंग कर रहा है.

बच्चों की सुरक्षा के साथ कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा खिलवाड़

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ही कोर्ट को शिक्षा विभाग की तरफ से बताया गया था कि करीब 64 हजार सरकारी स्कूलों के 84 हजार क्लासरूम जर्जर हालत में है और वहां बच्चों को नहीं बिठाया जा सकता है. अदालत ने इन क्लास रूम को खाली कराकर बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक इंतजाम किए जाने के निर्देश दिए थे. अदालत का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है.

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