Bangladesh Elections 2026: बांग्लादेश चुनाव में जीतेगी जमात-ए-इस्लामी? पाकिस्तान से इश्क फरमाने वाली पार्टी भारत से क्या चाहती है?

बांग्लादेश चुनाव में इस बार जमात की चर्चा कुछ ज़्यादा ही है. इस बीच पड़ोसी मुल्क में आम चुनाव के लिए मतदान शुरू हो चुका है. बांग्लादेश में 300 सीटों पर चुनाव हो रहा है. इस दौरान जमात ए इस्लामी जो कि पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी के विरोध में रहा है, वो अब बांग्लादेश की चुनावी फिजा में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाता दिख रहा है. बीते कई दशकों से जिस जमात ए इस्लामी को बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन का विरोधी माना जाता था, वही जमात ए इस्लामी अब बांग्लादेश के चुनाव में बीएनपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखी जा रहा है.

जमात ए इस्लामी के नेता शफीकुर रहमान जो सालों तक जेल में रहे और उनकी पार्टी जमात ए इस्लामी पर कट्टरपंथी सोच व कट्टरता बढ़ाने के आरोप में चुनावी बैन लगा. अब वही शफीकुर रहमान बांग्लादेश के पोस्टर ब्वॉय बने हुए हैं. 67 साल के पेशे से डॉक्टर शफीकुर रहमान जमात ए इस्लामी गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद के भी दावेदार हैं. शफीकुर रहमान ने साल 1984 में जमात को ज्वाइन किया था और साल 2019-20 में जमात ए इस्लामी के अध्यक्ष बनाए गए. शफीकुर रहमान की अगुवाई वाले इस गठबंधन में छात्र आंदोलन से उपजी NCP भी शामिल है.

जमात ए इस्लामी कट्टरपंथी संगठन

जमात ए इस्लामी ने पहली बार साल 2001 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार में हिस्सेदारी हासिल की थी. उस समय जमात के कुछ सदस्य कैबिनेट का हिस्सा थे. 2001 में खालिदा जिया बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं, लेकिन जब भी शेख हसीना सत्ता में रहीं तो जमात ए इस्लामी पर कड़े प्रतिबंध लगाकर रखे. जमात ए इस्लामी को एक कट्टरपंथी संगठन के तौर पर देखा जाता रहा है. इस संगठन की सोच अतिवादी मानी जाती है. हालांकि शफीकुर रहमान साल 2026 के चुनाव में इस संगठन की छवि को अलग तरह से पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. जमात के कुछ नेता अब धर्म की जगह मानवता की बात करते नज़र आते हैं. जमात ए इस्लामी के नेताओं की सोच काफी संकीर्ण देखी गई है. ख़ासतौर पर महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में यह दल काफ़ी दक़ियानूसी सोच रखता है. साल 2026 के आम चुनाव में जमात ए इस्लामी ने एक भी सीट पर महिला प्रत्याशी नहीं उतारा है.

भारत से बेहतर संबंधों की बात

अतीत में जमात ए इस्लामी का झुकाव पाकिस्तान की तरफ ज्यादा देखा गया है. हालांकि बदलते समीकरण में जब बांग्लादेश में जमात ए इस्लामी और बीएनपी के बीच सीधी लड़ाई तो जमात ए इस्लामी भारत समेत अन्य पड़ोसी देशों से बेहतर संबंधों की बात कर रहा है. जमात ए इस्लामी का एक छात्र संगठन है, जिसे छात्र शिबिर के नाम से जाना जाता है. साल 2024 के तख्तापलट के बाद ढ़ाका विश्वविद्यालय समेत 4 छात्र संगठनों का चुनाव छात्र शिबिर जीत चुका है. आम चुनाव में जमात ए इस्लामी 224 सीटों पर चुनावी मैदान में है और 30 सीटों पर इसकी प्रमुख सहयोगी दल NCP है. बाकी बची हुई सीटों पर अन्य 9 दलों के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं.

भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का वादा

जमात ए इस्लामी अपने चुनावी कैंपेन में भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का वादा कर रही है. इसके अलावा इस्लामी नियम कायदों और कानून पर ज़्यादा जोर दे रही है. यही नहीं बीएनपी और अवामी लीग से अलग हटकर एक बार जमात को वोट देने की अपील इसके नेता कर रहे हैं. जमात ने चुनाव में भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाया है. जमात ए इस्लामी के साथ एनसीपी का होना उसके समीकरण को मजबूत बनाता है, लेकिन अवामी लीग के समर्थक कभी जमात के साथ नहीं जा सकते हैं, ऐसी स्थिति में भले ही मजबूरी सही, लेकिन अवामी लीग के सपोर्टर बीएनपी के साथ जा सकते हैं. अगर ऐसा होता है कि जमात को तगड़ा झटका लगेगा. बांग्लादेश का अल्पसंख्यक समुदाय भी जमात को लेकर सहज नहीं रहता है. बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों में भी जमात को लेकर कई तरह की चिंताएं हैं. ख़ासतौर पर महिलाओं में इनके नियम क़ायदे और क़ानून को लेकर कई तरह के सवाल हैं. ऐसी स्थिति में बांग्लादेश का लगभग 9 फ़ीसदी अल्पसंख्यक जमात से दूरी बनाए नज़र आ सकता है. यही नहीं चुनावी हिंसा को लेकर जमात से एक डर बना रहता है.

हिंदू प्रत्याशी को भी टिकट दिया

इन शंकाओं और सवालों के बीच जमात ए इस्लामी ने बांग्लादेश की खुलना-1 सीट पर एक हिंदू प्रत्याशी को भी टिकट दिया है. यह एक प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है, जमात इस टिकट के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वो अल्पसंख्यक समुदाय से दूर नहीं है, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय का दिल और भरोसा जीतने के लिए महज एक टिकट ही पर्याप्त नहीं है. उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता और भविष्य की चिंता जरूर बनी रहती है. यह बात जरूर है कि जमात ए इस्लामी को इस बेहतर चुनाव का मौका कभी नहीं मिलेगा, लेकिन क्या जमात ए इस्लामी अपनी सोच और तौर तरीको को इन चुनावों के साथ साथ बदल पाएगा? यह बहुत बड़ा सवाल है, जिसका जवाब शायद जमात ए इस्लामी के पास भी नाजिर नहीं है.

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