
Copper Demand in India: इन्वेस्टमेंट इंफॉर्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (ICRA) ने उम्मीद जताई है कि देश में अगले 2 सालों में कॉपर की घरेलू खपत में सालाना आधार पर 10-12% बढ़ सकती है। हालांकि यह FY26 के पहले 7 महीनों में देखी गई 14-15% की बढ़ोतरी से धीमी गति से बढ़ेगी, क्योंकि मेटल की ज़्यादा कीमतों से शॉर्ट-टर्म डिमांड पर असर पड़ रहा है।
भारत में कॉपर का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जिसकी वजह तेज़ शहरीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन है। रेटिंग एजेंसी ने अपने एक बयान में कहा, “घरेलू स्तर पर, कॉपर की ज्यादा कीमतों से शॉर्ट-टर्म डिमांड ग्रोथ पर असर पड़ने की संभावना है, भले ही अंदरूनी डिमांड ड्राइवर हेल्दी बने रहें।”
रेटिंग एजेंसी के मुताबिक मीडियम-टर्म में, कॉपर की डिमांड एनर्जी-ट्रांज़िशन से जुड़े एप्लिकेशन, जैसे रिन्यूएबल एनर्जी, पावर ग्रिड, डेटा सेंटर और इलेक्ट्रिक गाड़ियों से तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है।
वहीं सप्लाई साइड पर घरेलू रिफाइंड कॉपर की कमी अनाउंस की गई। कैपेसिटी एडिशन और सप्लाई एडिक्वेसी में सुधार के साथ धीरे-धीरे कम होने का अनुमान है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि उसे कॉपर वैल्यू चेन में मार्जिन ट्रेंड के अलग-अलग होने की भी उम्मीद है, जिसमें अपस्ट्रीम कॉपर कंपनियों को मज़बूत कीमतों से फायदा होगा और ऑपरेटिंग प्रॉफिटेबिलिटी को सपोर्ट मिलेगा। हालांकि, डाउनस्ट्रीम स्मेल्टिंग और रिफाइनिंग कंपनियों को ट्रीटमेंट चार्ज में भारी कमी के कारण मार्जिन पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें क्रेडिट से केवल थोड़ी भरपाई ही हो पाएगी।
ग्लोबल कॉपर की कीमतों में मौजूदा फ़ाइनेंशियल ईयर में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो जनवरी 2026 तक लगभग USD 13,000 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है, जो फ़ाइनेंशियल ईयर की शुरुआत से लगभग 40% की बढ़ोतरी दिखाता है।
यह तेज़ी लगातार माइन-साइड सप्लाई में रुकावट, ओर ग्रेड में गिरावट और एक्सचेंजों में इन्वेंट्री में गड़बड़ी की वजह से आई है।
US में टैरिफ़ से जुड़ी अनिश्चितताओं और नए ट्रेड एक्शन के जोखिम की वजह से COMEX में इन्वेंट्री बढ़ी है और LME में कमी आई है, जिससे US के बाहर उपलब्धता कम हुई है और कीमतों को सपोर्ट मिला है।
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