Air Pollution And Mental Health: प्रदूषण बढ़ा रहा डिप्रेशन-एंग्जायटी का खतरा, हवा में मौजूद PM2.5 का मेंटल हेल्थ से सीधा कनेक्शन

Long Term Exposure To PM2.5 And Mental Health: केंद्र सरकार के बजट में भले ही मानसिक स्वास्थ्य ढांचे को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया हो, लेकिन एक नई नेशनल स्टडी ने चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर पेश की है. रिसर्च के मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में मौजूद बेहद सूक्ष्म कणों (PM2.5) के संपर्क में रहने से डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा बढ़ रहा है. ससे साफ है कि पर्यावरण से जुड़े जोखिम भारत में मेंटल की समस्या को और गहरा कर रहे हैं.

यह अध्ययन IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं ने AIIMS नई दिल्ली, NIMHANS और सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल iScience में पब्लिश किया गया है. रिसर्च में देश के 12 राज्यों, जिसमें जैसे पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और असम के 34,802 एडल्ट के डेटा का एनालिसिस किया गया.

क्या निकला रिसर्च में?

रिसर्च में पाया गया कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहने वालों में डिप्रेशन का खतरा 8 प्रतिशत तक अधिक और एंग्जायटी का जोखिम करीब 2 प्रतिशत ज्यादा था. यह विश्लेषण नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 से 16 के क्लिनिकली डायग्नोज़्ड मामलों पर आधारित है. चूंकि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह कारण नहीं बल्कि आपसी संबंध को दर्शाती है.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

AIIMS के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग से जुड़े स्टडी के लेखक डॉ. आनंद कृष्णा के मुताबिक, यह फर्क समझना जरूरी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जब बड़ी आबादी प्रदूषित हवा के संपर्क में हो, तो ऐसे “छोटे दिखने वाले” संबंध भी गंभीर मायने रखते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इसका असर सबसे ज्यादा शहरी महानगरों में रहने वालों, 40 से 49 साल की उम्र के लोगों और कम आय वर्ग में देखा गया. क्षेत्रीय स्तर पर भी फर्क सामने आया. पूर्वी भारत में प्रदूषण से जुड़ा डिप्रेशन ज्यादा क्लियर दिखा, जबकि पश्चिमी भारत में एंग्जायटी के मामले अधिक जुड़े पाए गए.

किन चीजों की हुई जांच?

स्टडी सिर्फ PM2.5 के कुल स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि हवा में मौजूद उसके अलग-अलग केमिकल तत्वों की भी जांच की गई. इसमें सामने आया कि ट्रैफिक, उद्योग और कृषि गतिविधियों से निकलने वाले सल्फेट, नाइट्रेट और अमोनियम जैसे तत्वों का डिप्रेशन से गहरा संबंध है. वहीं एलिमेंटल कार्बन, जो डीजल और फॉसिल फ्यूल के दहन का संकेतक माना जाता है, का संबंध एंग्जायटी से सबसे मजबूत पाया गया.

रिसर्चर का कहना है कि प्रदूषण के इन घटकों की पहचान से यह तय करने में मदद मिलती है कि किन उत्सर्जन सोर्स पर प्राथमिकता से कार्रवाई होनी चाहिए. ऐसे समय में, जब देश के कई हिस्सों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है, इस स्टडी में एनालिसिस में गुजरात, मणिपुर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तमिलनाडु और केरल के प्रतिभागियों को भी शामिल किया गया.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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