General MM Narvane Book: सेना ने अपने ही चीफ की बुक पर क्यों लगाई रोक? बवाल को समझें

पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की बुक फॉर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी, जिसे सरकार से छापने की अनुमति मिलनी बाकी है और जिसके संसद में जिक्र से तूफान खड़ा हो गया है. सेना और सरकार ने अपने पूर्व आर्मी चीफ की पुस्तक को प्रकाशित होने से आखिर क्यों रोक दिया. इस पर पूर्व थलसेना प्रमुख ने एबीपी न्यूज से बात करते हुए खुद ही स्पष्ट किया. 

आखिर एक पूर्व सेना प्रमुख को अपनी आत्मकथा छापने की इजाजत क्यों नहीं मिल रही है. वो भी तब जबकि किताब का कवर पेज प्रकाशित हो चुका है और कुछ हिस्से मीडिया में जारी हो चुके हैं. दरअसल, इसके पीछे है ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट (OSA)…एक ऐसा कानून जो किसी भी वर्दीधारी अधिकारी को अपने विभाग के बारे में कोई भी जानकारी प्रकाशित करने की खुली छूट नहीं देता है.

वर्ष 2020 में चीन के साथ गलवान घाटी की झड़प और उस दौरान उपजे सीमा विवाद के दौरान, जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (अब रिटायर) देश के सेना प्रमुख थे. उनका कार्यकाल शुरु हुआ था, 15 दिसंबर 2021 और पूरा हुआ था 30 अप्रैल 2022 को. अक्टूबर 2023 में जनरल नरवणे ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को एक इंटरव्यू के जरिए बताया कि उन्होंने अपनी आत्मकथा, ‘फॉर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ लिखी है. पीटीआई ने इस पुस्तक के कुछ अंश भी प्रकाशित किए. ऐसा करते ही बवाल खड़ा हो गया और रक्षा मंत्रालय ने बुक के पब्लिशर से प्रकाशित करने से पहले ड्राफ्ट भेजने का आदेश दिया. ड्राफ्ट को क्लीन चिट मिलने पर ही पब्लिशर इस पुस्तक को छाप सकता था, लेकिन अभी तक इस पुस्तक को रक्षा मंत्रालय और सेना से हरी झंडी नहीं मिली है.

जनरल नरवणे (रिटायर) ने अपनी पुस्तक में गलवान घाटी की झड़प (15-16 मई 2020) से लेकर चीन से हुए डिसएंगेजमेंट यानी सीमा विवाद को निपटाने को लेकर हुए समझौते के बारे में पूरी जानकारी सार्वजनिक कर दी थी. जैसा कि हम जानते हैं कि गलवान घाटी की हिंसा के दौरान, भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे. चीन को भी माना जाता है कि झड़प के दौरान भारी नुकसान उठाना पड़ा था.

अपनी पुस्तक में जनरल नरवणे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (NSA) अजीत डोभाल के साथ फोन पर बातचीत और मीटिंग को सिलसिलेवार तरीके से लिखा है. यहां तक कि कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) और चाइना स्टडी ग्रुप (CSG) की मीटिंग का भी जिक्र, जनरल नरवणे ने अपनी पुस्तक में किया है.

पूर्व थल सेनाध्यक्ष ने अपने मातहत कमांडरों के साथ हुई बातचीत और उन्हें दिए ऑर्डर (दिशा-निर्देश) भी पुस्तक में लिखे हैं. बस इन सब बातों के जरिए सरकार (रक्षा मंत्रालय) ने सीधे जनरल नरवणे के बजाए, पुस्तक को प्रकाशित करने वाले पब्लिशिंग हाउस से किताब का पूरा ड्राफ्ट तलब कर लिया. जो पुस्तक, अप्रैल 2024 में प्रकाशित की जानी थी, वो अभी तक साउथ ब्लॉक की अलमारी में बंद है.

दरअसल, ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट 1923 के तहत, देश की सुरक्षा से जुड़ी कोई भी संस्था या फिर खुफिया एजेंसियां जैसे आईबी, रॉ इत्यादि से जुड़े अधिकारी और पूर्व अधिकारी अपने विभाग या ऑर्गेनाइजेशन के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने या फिर पुस्तक लिखने से पहले, संबंधित विभाग से मंजूरी जरुर लेनी जरूरी है. वर्ष 2021 में इस कानून को संशोधन के जरिए अधिक कड़ा कर दिया गया था. इस कानून के तहत जनरल नरवणे की पुस्तक को रोक दिया गया है.

हाल में एक लिटरेचर फेस्टविल में जनरल नरवणे से पुस्तक को रिलीज करने को लेकर सवाल किया गया था. पूर्व थलसेना प्रमुख ने ये कहकर सवाल टाल दिया कि उन्होंने किताब का ड्राफ्ट लिखकर प्रकाशक को भेज दिया है. अब ये प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय के बीच है कि पुस्तक को कब प्रकाशित किया जाए. जानकारी के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय ने किताब को थलसेना के समक्ष भेज दिया है क्योंकि मौजूदा थलसेना प्रमुख या फिर सीडीएस इस किताब को लेकर आखिरी निर्णय कर सकते हैं क्योंकि पुस्तक के बारे में उनके विभाग से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक होने जा रही है.

अक्टूबर 2023 में पुस्तक को रोकने का एक बड़ा कारण ये भी था कि उस दौरान, चीन से पूर्वी लद्दाख में चल रहा विवाद जारी था. पूरे एक वर्ष बाद यानी अक्टूबर 2024 में पूर्वी लद्दाख का सीमा विवाद लगभग खत्म हुआ था. 22 अक्टूबर 2024 को भारत और चीन के बीच डिसएंगेजमेंट समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत, दोनों देशों की सेनाएं, विवादित इलाकों से पीछे हट गई थीं. हालांकि, अभी भी दोनों देशों के सैनिकों की संख्या में कोई भारी कमी नहीं आई है. डिसएंगेजमेंट प्रक्रिया के बाद पूर्वी लद्दाख में चीन से सटी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर डिएस्कलेशन और डि-इंडक्शन अभी बाकी है. ऐसे में ये कहना जल्दबाजी होगा कि भारत और चीन के संबंध एलएसी पर पूरी तरह सामान्य हो गए हैं.

पिछले वर्ष एससीओ (शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन) समिट के लिए पीएम मोदी की चीन यात्रा से भले दोनों देशों के संबंधों में पिछले पांच वर्षों से चल रही तकरार काफी कम हो गई है, लेकिन इसे स्थायी (या दीर्घकालिक) शांति मानना थोड़ा बेमानी है.

यहां याद रखना होगा कि 1962 में चीन के साथ हुई जंग को लेकर सरकारी रिपोर्ट, हेंडरसन-ब्रुक्स रिपोर्ट को सरकार ने आज तक डिक्लासिफाइड नहीं किया है क्योंकि पुस्तक में सेना की फॉरवर्ड फोर्मेशन की मूवमेंट के बारे में विस्तृत जानकारी है. ऐसा करने से सेना की क्लासिफाइड लोकेशन, पोस्ट और टेक्टिकल मूवमेंट की जानकारी दुश्मन को पता चल सकती है. ठीक वैसे ही, ‘फॉर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ से दुश्मन चाहे फिर वो चीन हो या पाकिस्तान, ये पता लगा सकता है कि किसी भी जंग के दौरान, भारत की पॉलिटिकल और मिलिट्री लीडरशिप कैसे रिएक्ट करती है और निर्णय लेने में कितना समय लगाती है. किसी भी युद्ध में ये दुश्मन के लिए ये जानकारी बड़ा हथियार साबित हो सकती है.

वैसे यहां ये बात भी दीगर है कि ये कोई पहली पुस्तक नहीं है, जो किसी पूर्व थलसेना प्रमुख ने लिखी है. इससे पहले, जनरल वी के सिंह अपनी आत्मकथा और जनरल वी पी मलिक की कारगिल युद्ध पर लिखी पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं. भले जनरल वीके सिंह का कार्यकाल विवादों में घिरा था, लेकिन उनके समय में चीन या पाकिस्तान के साथ कोई युद्ध नहीं हुआ था. जनरल मलिक ने कारगिल युद्ध पर अपनी पुस्तक को पाकिस्तान पर मिली पूर्ण विजय और रिटायरमेंट के कई साल बाद लिखी थी.

Read More at www.abplive.com