प्रेमानंद महाराज ने सुनाई लैला-मजनू की प्रेम कहानी: जानिए लैला ने कैसा पहचाना असली मजनू को?

Premananda Maharaj narrated story of Laila Majnu: लैला-मजनी की कहानी सदियों से प्यार की सबसे गहरी मिसाल मानी जाती रही है. मजनू की लैला के लिए दीवनगी, उसका दुनिया से कट जाना, जंगलों में इधर-उधर भटकना ये सब आम प्रेम कहानी का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक समर्पण भावना थी.

मजनू को लैला में अपना खुदा दिखने लगा था. यही कारण हैं कि, सूफी संतों ने इस कहानी को सांसारिक प्रेम नहीं, बल्कि ईश्वर-प्रेम का प्रतीक माना है. 

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वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने लैला-मजनू की इसी कहानी पर प्रकाश डाला है. महाराज जी हमेशा कहते हैं कि, व्यक्ति जब सच्ची भक्ति में होता है, तो वह अपनी पहचान भूल जाता है, उसे केवल ईश्वर ही दिखाई देता है, ठीक वैसे ही जैसे मजनू को हर ओर लैला दिखाई देती थी. प्रेमानंद महाराज इस कहानी को केवल दिल की कहानी ही नहीं, बल्कि आत्मा को जागने का मिसाल मानते हैं. 

प्रेमानंद महाराज ने लैला-मजनू की प्रेम कहानी सुनाई

लैला को पता चला कि मजनू भूखा-प्यासा घूम रहा है. बावरा सा, दुनिया से कट गया. लैला राजघराने की धनी लड़की थी. उसने तुरंत आदेश दिया, “बाजार में जहां भी, जिस दुकान में मजनू खाना चाहे, उसका पूरा हिसाब मैं दूंगी.”

जैसे ही यह ऐलान हुआ, लोग जान गए. लाखों मजनू रबड़ी खाने के लिए बाजार में आ गए. असली मजनू की पहचान करना अब मुश्किल था. लेकिन लैला ने कहा, “मैं असली मजनू को जानती हूं. कल कह दो, मुझे उससे मिलना है.”

अगले दिन हजारों मजनू वहां इकट्ठे हो गए. लैला पर्दे के पीछे खड़ी थी, हाथ में एक चाकू और एक कटोरा था. उसने कहा, “मजनू के दिल का खून चाहिए.”

भीड़ में जो मजनू केवल रबड़ी खाने आए थे, वह सब डरकर पीछे हट गए. और जो असली मजनू था, उसने मुस्कुराते हुए चाकू उठाया. जब लैला ने मारने को कहा, उसने सिर्फ इतना कहा, “मजनू यही है.”

वह मजनू जो अपनी जान, अपने दिल, और अपने अस्तित्व की परवाह किए बिना सिर्फ प्यार के लिए जीता था. वही असली मजनू था. बाकी सब केवल नाम के मजनू थे. यही प्रेम की सच्चाई थी: जिसने अपने प्यार के लिए सब कुछ छोड़ दिया, वही सच्चा प्रेमी कहलाता है.

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