
Market outlook : टैरिफ से जुड़ी चिंताओं और जियोपॉलिटिकल तनाव जैसे नेगेटिव ग्लोबल संकेतों के बावजूद घरेलू फंडामेंटल्स भारतीय इक्विटीज़ को मज़बूत सपोर्ट देंगे। अगर 2026 में ग्लोबल अनिश्चितता खत्म हो जाती तो मार्केट में तेजी आएगी। ये राय है एल्केमी कैपिटल मैनेजमेंट में को-फंड मैनेजर हिमानी शाह की। उनका कहना है फंडामेंटली ‘इंडिया स्टोरी’ काफी मज़बूत बनी हुई है। हालांकि, ग्लोबल लेवल पर जियोपॉलिटिकल अस्थिरता और ट्रेड की चिंताएं दबाव बनाए हुए हैं। लेकिन हमारे घरेलू इंडिकेटर्स कई अहम सेक्टरों में अलग कहानी कह रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग में एक स्ट्रक्चरल रिवाइवल देखने को मिल रहा। हाल के डेटा के अनुसार इसमें 12 महीने की सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली है। मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ रेट 8% पर है।
इसके अलावा, इनकम टैक्स और GST में कटौतियों ने मिडिल क्लास के जेब में काफी पैसे डाले हैं। इससे कंज्यूमर्स का खर्च बढ़ा है। हिमानी शाह का मानना है कि ग्लोबल दिक्कतें खत्म होने पर हमारे डोमेस्टिक ग्रोथ ड्राइवर मार्केट में फिर से जोश भर देंगे। उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में मार्केट में मिड-टू-हाई सिंगल-डिजिट ग्रोथ देखने को मिल सकती है। हालांकि, मार्केट ग्लोबल अस्थिरता से होने वाली अनिश्चितता को समझने में कुछ समय लेगा, जिससे शॉर्ट-टर्म में बाजार का परफॉर्मेंस थोड़ा कमज़ोर रह सकता है। लेकिन फंडामेंटल ‘रियल इकोनॉमी’ इंडिकेटर्स काफी उत्साहजनक बने हुए हैं।
उनका यह भरोसा हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा की मजबूती के आधार पर बना है। ऑटो सेल्स में फिर से तेज़ी (17-23% की बढ़ोतरी) देखने को मिल रही है, रिटेल में भी तेज़ी है। इसके साथ ही अच्छी क्रेडिट ग्रोथ भी देखने को मिल रही। यह बताता है कि हाल के टैक्स सुधार घरेलू मांग को अच्छे ढंग से बढ़ा रहे हैं। हालांकि, दिसंबर 2025 में सिर्फ 6% की दर से बढ़ने वाला ‘लगभग स्थिर’GST कलेक्शन,एक ऐसा अहम वेरिएबल बना हुआ है जिस पर नज़र बनी हुई है। अगर GST कलेक्शन में बढ़ोतरी होती है,तो हमें कम से कम मिड-टू-हाई सिंगल-डिजिट इंडेक्स रिटर्न देखने को मिल सकता है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह ग्रोथ हाई-क्वालिटी की हो सकती है, जो अर्निंग में बढ़ोतरी पर आधारित होगी क्योंकि वैल्यूएशन में पहले ही काफी करेक्शन हो चुका है।
अर्निंग ग्रोथ पर बात करते हुए हिमानी शाह ने कहा कि अर्निग्स में उतार-चढ़ाव की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं कर सकते। हालांकि Q3FY26 के नतीजों में अब तक काफी ग्रोथ और रिकवरी दिखी है, लेकिन Q4FY26 और उसके बाद इस ट्रेंड का बने रहना, सरकार की खर्च के लेवल को बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगा। अगर सरकार को राजकोषीय दिक्कतों के कारण अपने 11 लाख करोड़ रुपये के कैपेक्स प्लान में कटौती करनी पड़ती है, तो हम इंडस्ट्रियल और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अर्निंग में थोड़ी नरमी देख सकते हैं।
AI के रोजगार और बाजार पर असर की बात करते हुए हिमानी शाह ने कहा कि AI को अपनाने के चलन में बढ़ोतरी से ग्लोबल रोज़गार ग्रोथ के लिए एक बड़ी स्ट्रक्चरल चुनौती खड़ी हो रही है। यह बदलाव मुख्य रूप से वर्कफोर्स का ‘विस्थापन’ है,न कि हायरिंग में पूरी तरह से रोक। हमें AI के चलते भारी उलटफेर देखने को मिल रहा है। एक तरफ तो व्हाइट-कॉलर और सोचने-समझने वाली नौकरियों पर ऑटोमेशन से दबाव पड़ रहा है। वहीं, ‘रियल इकॉनमी’ यानी मैन्युफैक्चरिंग, स्पेशलाइज़्ड ट्रेड और फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर में अभी भी श्रमिकों की कमी महसूस हो रही है। इन सेक्टरों में कामगारों की मांग में मजबूती कायम है।
ऐसे में इन्वेस्टमेंट के नज़रिए से देखें तो हम ऐसी कंपनियों पर फोकस करते हैं जो बिना कर्मचारियों की संख्या बढ़ाए ऑपरेटिंग मार्जिन बढ़ाने के लिए AI का इस्तेमाल करती हैं,क्योंकि इससे अर्निंग्स पर शेयर (EPS) बढ़ता है। हम मास-मार्केट कंजम्पशन थीम्म को लेकर सतर्क रहते हैं, क्योंकि ये बड़े पैमाने पर व्हाइट-कॉलर सैलरी ग्रोथ पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती हैं। इसलिए, हमारी स्ट्रैटेजी ‘फिजिकल वर्ल्ड’ सेक्टर जैसे इंडस्ट्रियल और कैपिटल गुड्स पर फोकस करने की है, जहां इंसानी विशेषज्ञता की जगह कोई नहीं ले सकता।
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