
भारतीय शेयर बाजार में हाल के हफ्तों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। खासकर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में। ग्लोबल अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और घरेलू स्तर पर निवेशकों की सतर्कता ने बाजार के मनोबल को कमजोर किया है। हालांकि अल्फएक्यूरेट एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश कोठारी का मानना है कि यह घबराहट लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए जोखिम नहीं, बल्कि अवसर लेकर आई है।
हमारे सहयोगी CNBC-TV18 के साथ एक बातचीत में राजेश कोठारी ने कहा कि बाजार में इस समय डर के कारण बिकवाली हावी है, लेकिन इतिहास गवाह रहा है कि ऐसे ही चरणों में धैर्य रखने वाले निवेशकों को अगले दो से तीन सालों में बेहतर रिटर्न मिले हैं। उनके अनुसार, शॉर्ट-टर्म में बाजार असहज लग सकता है, लेकिन यही असहजता भविष्य के मजबूत रिटर्न की नींव रखती है।
ऑटो सेक्टर पर कायम भरोसा
ऑटो एंसिलरी और मैन्युफैक्चरिंग थीम
कोठारी की पसंद में ऑटो एंसिलरी कंपनियां भी शामिल हैं। उनका मानना है कि ये कंपनियां मूल वाहन निर्माताओं (OEMs) की तुलना में कमोडिटी कीमतों के उतार-चढ़ाव से ज्यादा सुरक्षित रहती हैं और गाड़ियों की बढ़ती कीमत का सीधा फायदा इन्हें मिलता है। इसके साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग को वे एक लॉन्ग-टर्म थीम के तौर पर देखते हैं, जिसमें ऑटो एंसिलरी, कैपिटल गुड्स, डिफेंस और एयरोस्पेस जैसे सेक्टर शामिल हैं।
उनका कहना है कि चीन से ग्लोबल कॉम्पिटीशन को लेकर जो आशंकाएं जताई जाती हैं, वे कई बार जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती हैं। भारत में मजबूत ऑर्डर बुक, डेटा सेंटर्स से बढ़ती मांग, ग्रिड स्टेबिलिटी की जरूरत और एआई आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, चुनिंदा कैपिटल गुड्स कंपनियों के लिए कई सालों की ग्रोथ का रास्ता तैयार कर रहे हैं।
कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी और हॉस्पिटल सेक्टर
ऑटो के अलावा, कोठारी अब कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी सेक्टर पर भी करीबी नजर रख रहे हैं। हालिया करेक्शन के बाद इस सेक्टर में वैल्यूएशन आकर्षक हो गए हैं और मांग में धीरे-धीरे सुधार की उम्मीद है। इसके साथ ही हॉस्पिटल सेक्टर को भी वे एक अहम अवसर मानते हैं। पिछले कुछ सालों में इस सेक्टर में बड़े पैमाने पर कैपेसिटी एक्सपेंशन हुआ है, जिसका असर आने वाले समय में मजबूत अर्निंग्स के रूप में दिख सकता है। करेक्शन के बाद अब वैल्यूएशन भी ज्यादा संतुलित नजर आ रहे हैं।
‘जीरो से थाउजेंड’ कंपनियों पर फोकस
राजेश कोठारी बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि असली अल्फा उन कंपनियों में बनता है, जो “जीरो से थाउजेंड” की यात्रा तय करती हैं। यानी सही बिजनेस मॉडल और मजबूत मैनेजमेंट वाली कंपनियां, जो मध्यम से लंबी अवधि में कई गुना रिटर्न देने की क्षमता रखती हैं।
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