
भारतीय संस्कृति में लोटा सिर्फ पानी पीने का बर्तन नहीं, बल्कि विज्ञान, ऊर्जा और अध्यात्म का अद्भुत संगम है. वैदिक काल से यह परंपरा चली आ रही है.

वेदों में कलश, घट और कमंडलु जैसे रूपों में इसका उल्लेख मिलता है. धार्मिक अनुष्ठानों में लोटे में जल रखना शुभ और पवित्र माना गया है.

वैज्ञानिक दृष्टि से लोटे का गोल आकार ऊर्जा को समान रूप से फैलाता है. जब इसमें जल रखा जाता है, तो भीतर हल्का वॉर्टेक्स प्रवाह बनता है, जो पानी के अणुओं को व्यवस्थित करता है.

लोटे की संकरी गर्दन पानी को हवा के कम संपर्क में रखती है, जिससे ऑक्सिडेशन कम होता है. इस कारण पानी की प्राणशक्ति यानी जीवंत ऊर्जा लंबे समय तक बनी रहती है.

तांबे का लोटा तो और भी विशेष है. तांबा एक प्राकृतिक रोगाणुनाशक धातु है, जो पानी में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है. यह हल्की विद्युत धारा उत्पन्न करता है, जिससे पानी शुद्ध और ऊर्जावान बन जाता है.

कहा गया है कि लोटे का आकार पूरी तरह संतुलित होता है. मंत्रोच्चारण या ॐ के उच्चारण पर यह एक ध्वनि प्रसारक पात्र की तरह काम करता है, जो कंपन तरंगों से जल की ऊर्जा को और बढ़ा देता है.

मानव शरीर की बनावट भी लोटे जैसी मानी गई है. गोलाकार पेट, संकरी गर्दन और ऊपरी सिर भाग है. इसलिए लोटे से जल ग्रहण करना सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि शरीर और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक भी है.
Published at : 11 Nov 2025 02:32 PM (IST)
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