Bhagavad Gita: मन पर विजय ही जीवन की सबसे बड़ी जीत, श्रीकृष्ण के इन उपदेशों में छिपा है जीवन का सार

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Bhagavad Gita: भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि मनुष्य का मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र है और सबसे बड़ा शत्रु भी है. जब मन वश में होता है तो जीवन में स्थिरता और संतुलन आता है, लेकिन जब वही मन चंचल हो जाता है, तो व्यक्ति अशांति और भ्रम में पड़ जाता है.

गीता अध्याय 6, श्लोक 5-6 में कहा गया है कि “मनुष्य को अपने ही मन के द्वारा ऊपर उठना चाहिए, क्योंकि मन ही उसका मित्र है और मन ही शत्रु है. श्रीकृष्ण कहते हैं कि जहां भी मन भटक जाए, वहीं से उसे आत्मा के अधीन कर लेना चाहिए. यह सतत अभ्यास और वैराग्य ही मनःशांति का वास्तविक साधन है. जब मन नियंत्रित होता है, तब व्यक्ति बाहर की परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने भीतर से शक्ति प्राप्त करता है.

मन ईच्छाओं से रहें अप्रभावित

गीता हमें सिखाती है कि सच्ची शांति बाहरी हलचल में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता में है. अध्याय 2, श्लोक 70 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं “जैसे समुद्र में अनेक नदियां गिरती हैं, फिर भी वह स्थिर रहता है, वैसे ही जो व्यक्ति इच्छाओं से अप्रभावित रहता है, वही शांति को प्राप्त करता है.

इस उपदेश से यह सीख मिलता है कि बाहर की दुनिया हमेशा परिवर्तनशील है, परंतु जो व्यक्ति अपने भीतर से शांत और संतुलित रहता है, वही जीवन के उतार-चढ़ाव में अडिग बना रहता है.

संतोष, आत्म-नियंत्रण बेहद जरूरी

गीता का अगला संदेश संतोष और आत्म-नियंत्रण पर केंद्रित है. अध्याय 6, श्लोक 7 में कहा गया है कि जिसका मन संतुष्ट है, जो अपने विचारों पर नियंत्रण रखता है. वह सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी जैसी स्थितियों में समान रहता है.

यही व्यक्ति सच्चे अर्थों में योगी कहलाता है. अध्याय 2, श्लोक 38 में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय सभी में संभाव से कर्म करो. यह संभाव ही जीवन का संतुलन है. गीता स्पष्ट करती है कि असली आनंद बाहर की वस्तुओं या परिस्थितियों में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता में है.

जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, क्रोध और विचारों पर विजय पा लेता है, तभी वह जीवन का सबसे बड़ा युद्ध जीतता है. गीता का सार यही है कि सच्ची शांति और आनंद भीतर हैं, जिन्हें प्राप्त करने के लिए मन का संयम, इच्छाओं का त्याग और संतुलित दृष्टि आवश्यक है.

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