भारत के इस मंदिर में 900 साल पुरानी भारतीय संत की रहस्यमी Mummy! जानिए चौंकाने वाला सच

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Guru Ramanujacharya 900-year-old mummy: आज जब हम Mummy शब्द सुनते हैं तो हमारे दिलों दिमाग में हॉलीवुड फिल्में या मिस्र के प्राचीन ताबूतों में बंद मृत शरीर याद आते है. लेकिन क्या सच में मृत शरीर को हजारों सालों तक सलामत रखा जा सकता है.

बता दें कि ऐसा करना संभव है, जिसे वैज्ञानिकों ने भी स्पष्ट कर दिया है. आज हम आपको मिस्त्र नहीं, बल्कि भारत में ही मौजूद 900 साल पुराने एक भारतीय संत की ममी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है.

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में 900 साल पुराने संत की ममी

दक्षिण भारत के श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (श्रीरंग, तिरुचिरापल्ली) में प्रसिद्ध संत और धार्मिक गुरु रामानुजाचार्य का शरीर आज भी सुरक्षित रखा गया है. इनका यह शरीर करीब 900 साल पुराना बताया जाता है, जिनके दर्शन करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं. 

दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक हिंदू धर्म में मान्यता है कि, केवल मृत्यु से ही व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि उसकी आत्मा को भी मुक्त करना जरूरी है, इसलिए मरने के बाद दाह संस्कार किया जाता है.

ईसाई और मुस्लिम धर्म में शव को दफनाया जाता है. वही मिस्र में ममी की तरह शरीर को सुरक्षित रखने की प्राचीन परंपरा रही है. इसी के परंपरा का पालन करते हुए गुरु रामानुजाचार्य के शरीर को भी सुरक्षित रखा गया है.

रामानुजाचार्य कौन थे?

गुरु रामानुजाचार्य एक भारतीय दार्शनिक, हिंदू धर्मशास्त्र के जानकार, समाज सुधारक और वैष्णव संप्रदाय से ताल्लुक रखते थे. रामानुजाचार्य के दार्शनिक विचारों ने ही भक्ति आंदोलन को प्रभावशाली बनाने का काम किया था.

आपको जानकार हैरानी होगी कि, गुरु रामानुजाचार्य के मृत शरीर को बैक्टीरिया से बचाने के लिए चंदन, हल्दी और केसर का पेस्ट लगाया जाता है. इसके अलावा साल में दो बार केसर के साथ कपूर का मिश्रण तैयार करके शरीर पर इसका लेप लगाया जाता है.

हल्दी, चंदन और कपूर के कोट का इस्तेमाल करने के कारण शरीर का रंग गेरुआ दिखाई देता है.

1137 ईसा पूर्व में ली समाधि

भक्तजन गुरु रामानुजाचार्य के दर्शन आसानी से कर सकते हैं. उनका शरीर मूर्ति के पीछे रखा गया है. उंगलियों के नाखूनों को देखकर पता लगाया जा सकता है कि यह शरीर असली है. 

श्री रामानुजाचार्य का शरीर श्रीरंगम मंदिर के अंदर पांचवें चक्र के दक्षिण-पश्चिम कोने में रखा गया है. मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह आदेश स्वयं भगवान रंगनाथ ने दिया था.

मान्यताओं के मुताबिक जब गुरु रामानुजाचार्य इस पृथ्वी को छोड़कर जाने वाले थे, तब उन्होंने इस बारे में अपने शिष्यों को बता दिया था. उन्होंने अपने शिष्यों को आज्ञा देते हुए कहा कि, वो और तीन दिन तक उनके साथ रहेंगे.

माना जाता है कि उन्होंने अपनी अंतिम सांस 1137 ईसा पूर्व में ली थी.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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