आपकी घड़ी से लेकर अग्नि-6 मिसाइल तक… इसमें जो जरूरी रेयर अर्थ मिनरल्स (REE) इस्तेमाल होते हैं, उनका 95% प्रोडक्शन सिर्फ चीन करता है. यानी चीन ने REE देना बंद कर दिया, तो न घड़ी चलेगी, न इलेक्ट्रिक गाड़ी चलेगी, न बिजली आएगी और न ही अमेरिकन F-35 फाइटर जेट्स बन पाएंगे. चीन के पास दुनिया में सबसे ज्यादा REE हैं और भारत तीसरे नंबर पर है. एक्सपर्ट्स की प्रेडिक्शन है कि 2035 तक REE इतने जरूरी हो जाएंगे कि इनके बिना किसी देश के लिए सुपर पॉवर बनना नामुमकिन होगा.
तो आइए ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि रेयर अर्थ मिनरल्स क्या हैं, चीन ने पूरी दुनिया के मिनरल्स पर कब्जा कैसे किया और इनके बिना कोई देश सुपर पॉवर क्यों नहीं बन सकता है…
सवाल 1- रेयर अर्थ मिनरल्स क्या और कैसे होते हैं?
जवाब- रेयर अर्थ मिनरल्स (REE) 17 खास धातुएं हैं, जो दिखने में साधारण मिट्टी जैसी लगती हैं, लेकिन ये आज की हाई-टेक दुनिया की जान हैं. ये ‘रेयर’ इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि ये धरती में हर जगह मिलते हैं, लेकिन शुद्ध रूप में निकालना बेहद मुश्किल और महंगा होता है. एक टन मिट्टी से सिर्फ 1-2 ग्राम शुद्ध REE निकलता है. 2030 तक दुनिया को 140 मिलियन EV चाहिए, जिसके लिए 4.9 लाख टन REE हर साल लगेंगे. यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) रिपोर्ट के मुताबिक, ये धातुएं ग्रीन एनर्जी, डिफेंस और AI समेत सभी टेक्नोलॉजी की रीढ़ हैं.
1. होल्मियम: यह दुनिया का सबसे ताकतवर चुंबकीय तत्व है. इसका इस्तेमाल लेजर उपकरणों, न्यूक्लियर रिएक्टर और हाई-टेक चुंबकों में होता है.
2. एर्बियम: यह गुलाबी रंग की चमक देता है, जिसे इंटरनेट नेटवर्क, मेडिकल लेजर और रंगीन ग्लास में इस्तेमाल किया जाता है.
3. थुलियम: यह ल्यूटेटियम के बाद सबसे दुर्लभ खनिज है, जिसका इस्तेमाल एक्स-रे मशीन, लेजर सर्जरी और मोबाइल लेजर डिवाइस में होता है.
4. युरोपियम: यह चमकीली लाल और नीली रोशनी पैदा करता है. इसे LED स्क्रीन, टीवी डिस्प्ले और नोट वाली स्याही में इस्तेमाल किया जाता है.
5. यटरबियम: यह बहुत जल्दी भाप बन जाता है. इसे स्टील, क्वांटम कंप्यूटिंग रिसर्च और मेडिकल इमेजिंग में इस्तेमाल किया जाता है.
6. सैमरियम: इससे बने चुंबक हाई टेम्परेचर पर अपनी ताकत नहीं खोते, जिस वजह से इसे हेडफोन और न्यूक्लियर हथियार बनाने में इस्तेमाल किया जाता है.
7. गैडोलीनियम: यह चुंबकीय, न्यूट्रॉन को सोख लेता है, जिससे इसे MRI मशीन, न्यूक्लियर रिएक्टर और रडार सिस्टम के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
8. टरबियम: टीवी-फोन में हरे रंग की लाइट पैदा करता है. इससे LED स्क्रीन, लाइटिंग, सेंसर और हाई टेम्परेचर चुंबक बनती है.
9. डिस्प्रोसियम: सफेद-पीली रोशनी पैदा करता है और हाई टेंपरेचर में ताकत नहीं खोता. इसे न्यूक्लियर रिएक्टर, हार्ड डिस्क ड्राइव और जनरेटर बनाने में इस्तेमाल किया जाता है.
10. ल्यूटेटियम: 17 दुर्लभ खनिजों में सबसे भारी और मजबूत है. ये पेट्रोलियम रिफाइनरी, मेमोरी डिवाइस और कैंसर कोशिकाओं को मारने में इस्तेमाल होता है.
11. स्कैंडियम: 17 दुर्लभ खनिजों में सबसे खास और बहुत हल्का है. ये रॉकेट-हेलिकॉप्टर फ्रेम, बेसबॉल बैट और LED बनाने में यूज होता है.
12. यिट्रियम: धरती पर सबसे ज्यादा पाया जाने वाला दुर्लभ खनिज है, जिससे रडार सिस्टम, सुपरकंडक्टर और कैमरा लैंस बनाए जाते हैं.
13. सीरियम: रासायनिक क्रियाों में ऑक्सीकरण में मददगार होता है. इसे ग्लास पॉलिशिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल किया जाता है.
14. लैंथेनम: हाइड्रोजन अवशोषण में अच्छा है, जिससे सुपरकंडक्टर्स और परमाणु रिएक्टर बनते हैं.
15. प्रोमिथियम: विकिरण करता है, इसलिए ऊर्जा के स्रोत के रूप में उपयोगी है, जिससे न्यूक्लियर रिसर्च और थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर में इस्तेमाल किया जाता है.
16. नियोबियम: इसकी हाई सुपरकंडक्टिविटी है, जिस कारण सुपरकंडक्टर्स, एयरोस्पेस और जेट इंजन में इस्तेमाल होता है.
17. टैंटलम: इसमें जंग नहीं लगता और एसिड का असर नहीं होता है. इसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक, मेडिकल और एयरोस्पेस में होता है.
सवाल 2- दुनिया में सबसे ज्यादा REE किस देश के पास हैं?
जवाब- चीन के पास दुनिया के सारे 17 REE हैं, लेकिन सबसे ज्यादा लाइट REE (Nd, Pr, Ce) और हैवी REE (Dy, Tb) हैं. दुनिया की सबसे बड़ी माइन भी चीन में है, जिसे 1927 में खोजा गया था. इसमें 57 मिलियन टन से ज्यादा REE रिजर्व हैं. USGS के मुताबिक, चीन दुनिया का 70% REE रिजर्व और 95% प्रोडक्शन कंट्रोल करती है. इसके बाद-
- ब्राजील में 21 मिलियन टन REE हैं.
- भारत तीसरे स्थान पर है, जहां 6.9 मिलियन टन REE हैं.
- ऑस्ट्रेलिया के पास 5.7 मिलियन टन REE हैं.
- रूस के पास 3.8 मिलियन टन और वियतनाम के पास 3.5 टन REE हैं.
- अमेरिका के पास 1.9 मिलियन टन और ग्रीनलैंड में 1.5 मिलियन टन REE हैं.
सवाल 3- चीन ने दुनिया का REE का 70% रिजर्व और 95% प्रोडक्शन कैसे हथिया लिया?
जवाब- ये कोई इत्तेफाक नहीं, ब्लकि चीन का 40 साल पुराना प्लान था…
- 1980: चीन ने REE पर सब्सिडी दी, पर्यावरण नियम ढीले रखे और एक्सपोर्ट टैक्स रिबेट दिए. चीन ने जानबूझकर REE की कीमतें 70% तक गिरा दीं, ताकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और भारत समेत सभी देश REE खनन बंद कर दें. सभी देशों ने सोचा कि जब सस्ते दामों में इम्पोर्ट किया जा सकता है, तो फिर ज्यादा पैसा लगाकर माइनिंग क्यों करें.
- 1986-1992: बाओटौ को ‘रेयर अर्थ कैपिटल’ बना दिया.
- 1990: REE को ‘स्ट्रैटेजिक रिसोर्स’ घोषित किया और फॉरेन इन्वेस्टमेंट बैन कर दिया.
- 1999: अमेरिका की माउंटेन पास माइन बंद हो गई. यही हाल ऑस्ट्रेलिया और भारत में भी हुआ.
- 2010: जापान के साथ विवाद में 2 महीने एक्सपोर्ट रोका, जिससे REE की कीमतें 500% बढ़ गईं.
- 2023: NdPr, DyTb पर टेक एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया.
- 2024: 7 हैवी REE (सैमरियम, गैडोलीनियम, टेरबियम, डिस्प्रोसियम, ल्यूटेटियम, स्कैंडियम और यिट्रियम) पर बैन लगा दिया. इन एलिमेंट्स का एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों के लिए स्पेशल एक्सपोर्ट लाइसेंस लेना जरूरी कर दिया, जिस वजह से दुनियाभर में REE की सप्लाई बाधित हो गई.
- 2025: 5 और REE (होल्मियम, एरबियम, थुलियम, यूरोपियम और यिट्रियम) को बैन कर दिया. इससे 12 मिनरल्स चीन के कंट्रोल में हो गए.इनके इस्तेमाल से पहले चीन से एक्सपोर्ट लाइसेंस लेना जरूरी हो गया.
चीन ने कीमतें गिराकर बाकी दुनिया को मार्केट से बाहर किया और फिर जरूरी मिनरल्स पर बैन लगाकर सबको झुका दिया. आज 2025 में चीन 270,000 टन REE प्रोड्यूस करता है.
सवाल 4- किसी देश को सुपर पॉवर बनने के लिए REE की जरूरत क्यों है?
जवाब- किसी देश को सुपरपावर बनने के लिए REE की जरूरत इसलिए है क्योंकि अगले 25 साल में दुनिया का सारा पॉवर इसी चीज से चलेगा. इसके अलावा 2035 में सुपर पॉवर की पहचान हथियार से होगी. जो देश सबसे खतरनाक हथियार बनाएगा, वही सुपर पॉवर कहलाएगा. सारे खतरनाक हथियार REE के बिना नहीं बन सकते हैं. जैसे F-35 फाइटर जेट बनाने के लिए 417 किलोग्राम नियोडिमियम चाहिए, अगर चीन बंद कर दे तो 18 महीनों में अमेरिका की एयरफोर्स खत्म हो जाएगी. भारत की अग्नि-6 मिसाइल में 9 किलोग्राम समैरियम-कोबाल्ट मैग्नेट चाहिए. चीन न दे तो 8,000 किलोमीटर रेंज की मिसाइल कागज पर रह जाएगी. एक अमेरिकी पनडुब्बी में 4,200 किलोग्राम REE लगता है, चीन ने न दिया तो एक भी नई पनडुब्बी नीं बनेगी. यानी जो देश REE कंट्रोल करेगा, वही सुपर पॉवर कहलाएगा.
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी REE का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है. कल्पना कीजिए कि एक सुबह आप सोकर उठे, तो REE नहीं होने से आपकी घड़ी नहीं बजेगी, क्योंकि उस छोटी सी वाइब्रेशन मोटर में 0.3 ग्राम नियोडिमियम मैग्नेट होता है. आपकी इलेक्ट्रिक स्कूटी स्टार्ट नहीं होगी, क्योंकि उसकी मोटर में 3 किलोग्राम REE मैग्नेट होता है. आपके घर और स्कूलों में लाइट नहीं जलेगी, क्योंकि विंड टर्बाइन नहीं चलेगा, जिसके लिए 4 टन REE मैग्नेट चाहिए. आपके फोन में इंटरनेट नहीं चलेगा, क्योंकि 6G टॉवर में येट्रियम चाहिए. यहां तक कि AI भी चीन के बिना काम नहीं कर पाएगा, क्योंकि एक AI डेटा सेंटर में 20 टन REE (कूलिंग और मैग्नेटिक स्टोरेज) चाहिए.
सवाल 5- भारत को 2047 तक सुपरपॉवर बनने के लिए क्या-क्या करना पड़ेगा?
जवाब- भारत को 2047 तक सुपरपॉवर बनने के लिए REE पर पूरा कंट्रोल जरूरी है. आज हम 95% REE चीन से इम्पोर्ट करते हैं, लेकिन हमारे पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रिजर्व है. USGS 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, हमारा प्रोडक्शन हर साल सिर्फ 2,900 टन है, जो चीन के 270,000 टन का 1% भी नहीं है.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर हम 2047 तक EV, डिफेंस और ग्रीन एनर्जी में वर्ल्ड लीडर बनना चाहते हैं, तो अगले 22 साल में हमें चीन जैसी पूरी सप्लाई चेन खुद बनानी पड़ेगी.
- 2030 तक का शॉर्ट-टर्म टारगेट में प्रोडक्शन को 10 गुना बढ़ाना होगा.
- IREL की ओडिशा प्लांट को डबल करके 2026 में NdPr प्रोडक्शन 450 टन और 2030 तक 900 टन तक बढ़ाना होगा.
- GSI को 2030-31 तक 1,200 ब्लॉक्स एक्सप्लोर करने होंगे. 195 पहले से चल रहे हैं.
- विशाखापत्तनम में REPM प्लांट की कैपेसिटी 3,000 किलोग्राम सालाना शुरू करना होगा.
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